Friday, 9 August 2013

मैं और मेरी तलाश ........

अम्बर से पाताल तक 
पग-पग पर जहाँ 
तिलिस्म हो ,
गहन कोहरा छाया हो 
जहाँ रिश्तों में जमी 
बर्फ़ का ...
सुनो जरा , अपना ठौर बना लूँ 
मैं ।

अनंत के विस्तार में जहाँ 
खो गए हों शब्द 
अपने ही विन्यास में 
और जा मिलें 
नि:शब्द से ...
ठहरो जरा , अपना पैर जमा लूँ 
मैं ।

रेखाओं से रेखायें कटती हों 
जहाँ रीतापन ही भरता हो 
और दर्पण झूठा लगता हो 
जहाँ जिस्म ही जिस्म कटते हों ...
आओ जरा , अपना दामन भर लूँ 
मैं ।

जहाँ सायों का लगता मेला हो 
यादों का लगता डेरा हो 
जहाँ पसरा घोर अँधेरा हो 
हर चेतन डूबे जहाँ 
अवचेतन में ...
चलो जरा , अपना घर बना लूँ 
मैं ।

20 comments:

  1. बहुत बढ़िया आंटी
    तीज और ईद मुबारक हो!


    सादर

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    1. आभार आपका ।
      ईद आपको भी मुबारक ।
      तीज में माता रानी आपको आशीर्वाद दें यही कामना है ।

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  3. कल 11/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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    1. आभार , यशवंत जी

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  4. शून्य से विस्तार की ओर ।

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  5. वाह...
    अनंत के विस्तार में जहाँ
    खो गए हों शब्द
    अपने ही विन्यास में
    और जा मिलें
    नि:शब्द से ...
    ठहरो जरा , अपना पैर जमा लूँ
    मैं ।
    बहुत बहुत सुन्दर!!!!

    अनु

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  6. जहाँ रिश्तों में जमी
    बर्फ़ का ...
    सुनो जरा , अपना ठौर बना लूँ
    मैं ।.... वाह नीता जी , सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  7. वाह नीता पहली बार तुम्हारे ब्लॉग पर आना हुआ ....मज़ा आ गया ...बहुत सुन्दर लिखती हो...

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    1. हार्दिक स्वागत आपका , सरस जी
      आपके प्रोत्साहन की ह्रदय से आभारी हूँ

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  8. जीवन और प्रेम की गहराईयों में समाई हुई कविता .. दिल को छु गयी जी ..

    दिल से बधाई स्वीकार करे.

    विजय कुमार
    मेरे कहानी का ब्लॉग है : storiesbyvijay.blogspot.com

    मेरी कविताओ का ब्लॉग है : poemsofvijay.blogspot.com

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  9. अनंत के विस्तार में जहाँ
    खो गए हों शब्द
    अपने ही विन्यास में
    और जा मिलें
    नि:शब्द से ...
    ठहरो जरा , अपना पैर जमा लूँ
    मैं ।
    बहुत सुन्दर

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