Thursday, 25 April 2013

दोस्त

दरख्त है इक
जो सदियों से
दोस्त था मेरा ।

हर इक आहट
मेरी
पहचानता था ।

बिन कहे
शब्द मेरे
पहुँचते थे
उस तक ।

हवा का
रूख
बदल गया ,
वो
जाने कहाँ
गुम गया .....

ढूंढती हूँ
भटकती हूँ ,
ख़ोजती हूँ
उसे ।

हर इक
दर-ओ-दीवार
झांकती हूँ ।

हर इक
चेहरा
अजनबी है ,
बेगाना है ।

वो जो
इक अपना है
गुम गया .....

क्या
तुमने
उसे
देखा है .....

क्या तुमने उसे देखा है ???

3 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  2. खूबसूरत भीनी अभिव्यक्ति .. पता है कि वो ही है ... जो सुनता है अपनी, मगर आँखों से ओझल ... और अब नयन परेशां ..

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