कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **: वर्जित यादें
बहुत सुन्दर
मेरा मानना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है । सपने हर कोई देखता है और यही सपने एक विचार बन जाते हैं । हम यदि अपने विचारों को एकत्र कर लें तो एक ख़ूबसूरत आकृति बन जाती हैं । कुछ कही , कुछ अनकही .......
Saturday, 8 June 2013
Tuesday, 4 June 2013
गर्म लू के थपेड़े
ख़िड़की के बाहर भी , और
मन के अन्दर भी
तूफ़ान मचा देते हैं ।
पहरों बहते हैं
सूरज के उगने के साथ
और
चाँद के आने से पहले ।
उनका तो कोई
रूख नहीं होता
दिशा भी नहीं होती ...
मन भी बह जाता है
उन सब गर्म थपेड़ों के साथ
जो मिले हैं जमाने से
इक उम्र के साथ ।
उनकी भी तो कोई
दिशा नहीं होती
न होता है
किसी रूख का पता ...
साल-दर-साल
पल-पल
हर क्षण
मौसम के बदलते ही
आ मिलते हैं
किसी ख़ास दोस्त की तरह ।
बाहर भी
भीतर भी
तपन झेलनी होती है
जिन्दा भी
रहना ही होता है
हर इक
ऋतु के साथ ...
ख़िड़की के बाहर भी , और
मन के अन्दर भी
तूफ़ान मचा देते हैं ।
पहरों बहते हैं
सूरज के उगने के साथ
और
चाँद के आने से पहले ।
उनका तो कोई
रूख नहीं होता
दिशा भी नहीं होती ...
मन भी बह जाता है
उन सब गर्म थपेड़ों के साथ
जो मिले हैं जमाने से
इक उम्र के साथ ।
उनकी भी तो कोई
दिशा नहीं होती
न होता है
किसी रूख का पता ...
साल-दर-साल
पल-पल
हर क्षण
मौसम के बदलते ही
आ मिलते हैं
किसी ख़ास दोस्त की तरह ।
बाहर भी
भीतर भी
तपन झेलनी होती है
जिन्दा भी
रहना ही होता है
हर इक
ऋतु के साथ ...
Saturday, 18 May 2013
लड़की
वह लड़की
आज भी अकेले बैठी
सोचती रहती है
बीते हुए अनेक पलों को ,
पंख लग जाते हैं
उसकी सोच को ।
देखती है ख़्वाब में
जागते हुए
अपना नन्हा -
सुन्दर बस्ता
गुलाबी रंग का
जिस पर बनी थीं
उड़ती हुई
रंग-बिरंगी तितलियाँ ।
वो प्यारा-सा बस्ता
एकान्त में
किताबों से
बातें किया करता ,
उसे भी भाता था
सफ़र
घर से स्कूल का ।
संगी-साथी
दोस्त भी
उसके खूब थे ,
जिनके साथ
उसने ख़ोजे
नए रास्ते
अनेक थे ।
छोटा था
वो पहला सफ़र
पर था बहुत ही
अच्छा ।
आगे सफ़र
मुश्किल हुए ,
दोस्त भी
अब बदल गए ,
बस्ते का भी रंग
अब
गुलाबी न रहा ,
तितलियाँ भी
कहीं उड़ गईं .....
सोचती रहती है लड़की ,
सोचती ही रहती है ...........
Tuesday, 30 April 2013
गुप्तार घाट के तट से .....
| गुप्तार घाट |
सरयू का जल
संध्या बेला में
छवि
वैदेही की
ले आता है ।
साक्षी हैं
इस घाट के
किनारे पड़ी मिट्टी का
एक-एक कण ,
छोटी-छोटी
बुर्जियों के
इक-इक कंगूरे--
कि खोए रहते हैं
पहरों-पहर
याद में
प्रभु
वैदेही के ।
हर दिन
प्रातःकाल का सूरज
प्रणाम करता है
जगजननी को
और
विदा लेता हुआ
साक्ष्य लिए जाता है
शोक में डूबे
प्रभु के
दर्शन के ।
यहाँ से
गुजरने वाली हवा भी
उदास
निःशब्द बहती है
परन्तु बेबसी अपनी
प्रकट नहीं करती है ।
साक्षी है
धरा
और अम्बर भी
प्रभु की
पीड़ा के ...
दुःख के ...
गवाह है
तारा-मण्डल भी
कि विकल हो
पीड़ा से
विछोह की
प्रभु
तज राजपाट
वैभव इह लोक के
बढ़े चले गए
गहरे जल में
मिलने अपनी
प्रिया से ।
न पीछे किसी का मोह था
न रूदन ही था सुनाई दिया
सारे जग का ,
बढ़े गए ...
चलते गए ...
विलीन हुए
इसी सरयू के
अथाह
गहरे
जल में ।
साक्षी थी धरा ,
साक्षी था अम्बर ...
जो आज भी
उदास
मौन
निःशब्द
प्रतिदिन
सरयू के जल में
वैदेही
और
प्रभु की
युगल-छवि देखते हैं ।
Saturday, 27 April 2013
अपना घर .....
जन्म हुआ .... दादा-दादी बहुत रोए ..... पिता की आँख छलक उठी ..... एक सिसकी निकली बस .....
पांच वर्ष की हुई .... माँ को आदेश मिला ... फ़्राक के साथ सलवार पहनाओ अब ..... अवहेलना करी .... कहा गया ... अपने घर जाना , जो चाहे करना ....सिर झुक गया .....
तेरह साल की हुई ..... आदेश हुआ ... सिर पर दुप्पटा ओढ़ कर रहो .... आँख उठा कर देखा .... कहा गया ... भले घर की लड़कियाँ-औरतें नज़र नीची रखती हैं ... अपने घर जाना तो सिर उघाड़े फिरना .... पर्दा हो गया .....
पन्द्रह साल की हुई .... बताया गया ... शहर के नामी लोग हैं , जमींदार घराना है , चार दिन बाद आ रहे हैं चुन्नी ओढ़ाने .... आगे पढ़ने की इच्छा जताई .... कहा गया ... अपने घर जाना तो यूनिवर्सिटी भी घूम आना .... किताब बन्द कर दी .....
सोलह साल की हुई .... लाल चुनरी पहन ली .... कहा गया ... हमारे घर में स्त्रियाँ घूँघट करती हैं .... घूँघट ओढ़ लिया .... पति संग चाय पीने को पूछा ... कहा गया ... हमारे घर में बेशर्मी नहीं चलती .... चाय रसोई में चली गई .....
सत्रह साल की हुई .... बेटी आ गई .... कहा गया ... हमारे कुल की नाक कटा दी .... सिर जमीन में घुस गया .....
उन्नीस साल की हुई .... दूसरी बेटी आ गई .... कहा गया ... जब सब खा लें तब जो बचे इसे दे देना .. हमारा तो वंश ही ख़त्म कर दिया .... भूख मिट गई .....
बीसवां साल इक उजाला ले आया .... बेटा आ गया .... कहा गया ... हमारी मनौती का असर है , कुलदीपक आ गया .... आँख झुक गई .....
साल बीतते गए .... बेटियाँ अपने पति के घर चली गईं .... बेटा पिता का हाथ बटाने लगा .... कहा गया ... हमारा खून है .... नतमस्तक हो गई .....
बेटे का विवाह हुआ ... बहू आई .... चाभियाँ उसे सौंप दी गईं .... कहा गया ... पढ़ी-लिखी है , उचित प्रबन्ध करेगी .... किनारे खिसक गई .....
पोता आया .... ढोल-नगाड़ा बजा .... घर का मान बढ़ाने वाला आ गया .... धरती को देखती रही .....
पोता पढ़ गया , ऊँचे पद पर नौकरी करने लगा .... कहा गया ... पीछे कमरे में रहा करो , मेहमान आते हैं .... कोठरी में चली गई .....
शोर मचा था ... विमान सजा था .... वह अपने घर चली गई थी ... सदा के लिए .... आँख बन्द थी .... मुँह पर सन्तोष था .........
पांच वर्ष की हुई .... माँ को आदेश मिला ... फ़्राक के साथ सलवार पहनाओ अब ..... अवहेलना करी .... कहा गया ... अपने घर जाना , जो चाहे करना ....सिर झुक गया .....
तेरह साल की हुई ..... आदेश हुआ ... सिर पर दुप्पटा ओढ़ कर रहो .... आँख उठा कर देखा .... कहा गया ... भले घर की लड़कियाँ-औरतें नज़र नीची रखती हैं ... अपने घर जाना तो सिर उघाड़े फिरना .... पर्दा हो गया .....
पन्द्रह साल की हुई .... बताया गया ... शहर के नामी लोग हैं , जमींदार घराना है , चार दिन बाद आ रहे हैं चुन्नी ओढ़ाने .... आगे पढ़ने की इच्छा जताई .... कहा गया ... अपने घर जाना तो यूनिवर्सिटी भी घूम आना .... किताब बन्द कर दी .....
सोलह साल की हुई .... लाल चुनरी पहन ली .... कहा गया ... हमारे घर में स्त्रियाँ घूँघट करती हैं .... घूँघट ओढ़ लिया .... पति संग चाय पीने को पूछा ... कहा गया ... हमारे घर में बेशर्मी नहीं चलती .... चाय रसोई में चली गई .....
सत्रह साल की हुई .... बेटी आ गई .... कहा गया ... हमारे कुल की नाक कटा दी .... सिर जमीन में घुस गया .....
उन्नीस साल की हुई .... दूसरी बेटी आ गई .... कहा गया ... जब सब खा लें तब जो बचे इसे दे देना .. हमारा तो वंश ही ख़त्म कर दिया .... भूख मिट गई .....
बीसवां साल इक उजाला ले आया .... बेटा आ गया .... कहा गया ... हमारी मनौती का असर है , कुलदीपक आ गया .... आँख झुक गई .....
साल बीतते गए .... बेटियाँ अपने पति के घर चली गईं .... बेटा पिता का हाथ बटाने लगा .... कहा गया ... हमारा खून है .... नतमस्तक हो गई .....
बेटे का विवाह हुआ ... बहू आई .... चाभियाँ उसे सौंप दी गईं .... कहा गया ... पढ़ी-लिखी है , उचित प्रबन्ध करेगी .... किनारे खिसक गई .....
पोता आया .... ढोल-नगाड़ा बजा .... घर का मान बढ़ाने वाला आ गया .... धरती को देखती रही .....
पोता पढ़ गया , ऊँचे पद पर नौकरी करने लगा .... कहा गया ... पीछे कमरे में रहा करो , मेहमान आते हैं .... कोठरी में चली गई .....
शोर मचा था ... विमान सजा था .... वह अपने घर चली गई थी ... सदा के लिए .... आँख बन्द थी .... मुँह पर सन्तोष था .........
Thursday, 25 April 2013
दोस्त
दरख्त है इक
जो सदियों से
दोस्त था मेरा ।
हर इक आहट
मेरी
पहचानता था ।
बिन कहे
शब्द मेरे
पहुँचते थे
उस तक ।
हवा का
रूख
बदल गया ,
वो
जाने कहाँ
गुम गया .....
ढूंढती हूँ
भटकती हूँ ,
ख़ोजती हूँ
उसे ।
हर इक
दर-ओ-दीवार
झांकती हूँ ।
हर इक
चेहरा
अजनबी है ,
बेगाना है ।
वो जो
इक अपना है
गुम गया .....
क्या
तुमने
उसे
देखा है .....
क्या तुमने उसे देखा है ???
जो सदियों से
दोस्त था मेरा ।
हर इक आहट
मेरी
पहचानता था ।
बिन कहे
शब्द मेरे
पहुँचते थे
उस तक ।
हवा का
रूख
बदल गया ,
वो
जाने कहाँ
गुम गया .....
ढूंढती हूँ
भटकती हूँ ,
ख़ोजती हूँ
उसे ।
हर इक
दर-ओ-दीवार
झांकती हूँ ।
हर इक
चेहरा
अजनबी है ,
बेगाना है ।
वो जो
इक अपना है
गुम गया .....
क्या
तुमने
उसे
देखा है .....
क्या तुमने उसे देखा है ???
Monday, 22 April 2013
बातें .....
कबरिस्तान की
ख़ामोशी
बातें बहुत करती है ।
हवा वहाँ
हर आतन्तुक का
स्वागत
अपनत्व से करती है ।
मन सुनता
और बतियाता है
हर उस अनजानी
सरगोशियों से
जो सिरहानों से निकलकर
रूह में
आ बैठी
फ़ुसफुसाती है ।
ज़िन्दा अगर होता
इक नन्हा सा
दिल ,
बतियाता जरूर
बेले की
अकेली
उगी
महकती
झाड़ी से ।
रिश्तों की
सम्बन्धों की ,
यारी - दोस्तियों की
बेशुमार कहानियाँ
सो रहीं हैं
यहाँ
सदियों से ।
कुछ जानी
कुछ अनजानी
टेढ़ी-मेढ़ी
राहों से
गुज़री है
इसी जमीं से ।
कबरिस्तान की
ख़ामोशी
बातें
बहुत करती है .....
ख़ामोशी
बातें बहुत करती है ।
हवा वहाँ
हर आतन्तुक का
स्वागत
अपनत्व से करती है ।
मन सुनता
और बतियाता है
हर उस अनजानी
सरगोशियों से
जो सिरहानों से निकलकर
रूह में
आ बैठी
फ़ुसफुसाती है ।
ज़िन्दा अगर होता
इक नन्हा सा
दिल ,
बतियाता जरूर
बेले की
अकेली
उगी
महकती
झाड़ी से ।
रिश्तों की
सम्बन्धों की ,
यारी - दोस्तियों की
बेशुमार कहानियाँ
सो रहीं हैं
यहाँ
सदियों से ।
कुछ जानी
कुछ अनजानी
टेढ़ी-मेढ़ी
राहों से
गुज़री है
इसी जमीं से ।
कबरिस्तान की
ख़ामोशी
बातें
बहुत करती है .....
Subscribe to:
Posts (Atom)